ये रात यू ही ढलते-ढलते ढल जाएगी,
दिल पत्थर है, फिर भी ओस की तरह बिखर जाएगी।
काले बादल यू ही छाते-छाते छा जाएंगे
बारिश का मौसम है नहीं, बारिश फिर भी आ जाएगी।
ईद को गए हफ्ता-सप्ताह महीना हो गया,
मत निकाल घर से , फिर से ईद की नमाज़ हों जाएगी।
खुद को रोक, तुझे भुलाते-भुलाते भूल रहा हूं,
नाम मत लो कोई उसका, एक ही मोहब्बत दो बार हो जाएगी।
मैं आज यू ही कहते-कहते कैह जाऊंगा
अगर तूने अब भी ना सुना, तो बात बहुत बिगड़ जाएगी
और मैं यू ही मरते-मरते मर जाऊंगा,
तूने फिर भी ना मुड़ के देखा, तो ये रूह मेरी दो गज के टुकड़े को आसमां में भी तरस जाएगी।