कहाँ मैयस्सर है कि मैं कोई उजाले देखूँ
नसीब में है अब्र भी अब बस काले देखूँ ।।
आबाद किया था जिसे दोनों ने मिल के
उस मकाँ में कैसे तन्हाई के जाले देखूँ ।।
निकलूँ तेरी यादो की अँधेरी कोठरी से
तो मैं भी इस शहर के वो उजाले देखूँ ।।
टूट के बिखरते वक़्त तक ख़्वाहिश थी
कि तेरे हाथों ख़ुद को मैं सँभाले देखूँ ।।
बेकस मैं ना-तवाँ मेरी कोशिश हो गयी है
मगर कैसे मैं तुझे रक़ीब के हवाले देखूँ ।।
निकला हूँ तलाश में इश्क़ पाने वालों की
कैसे दिखते हैं ज़रा शख़्स वो वाले देखूँ ।।
