तुने हाथ तो छुड़ा लिया बता अब किधर जाऊँ 

सहने ये मोहब्बत की जफ़ा अब किधर जाऊँ ।।


तेरा वो दिल ही तो ठिकाना था इकलौता मेरा

तूने भी निकाल फैंका है तो अब किधर जाऊँ ।।


तेरे ही चेहरे के पहरे लगे हैं हर रहगुज़र पर तो

क़ैद-ए-अक़्स से निकल के अब किधर जाऊँ ।।


वजह-ए-वहशत-ए-खिल्क़त से छलक ना सके

बहाने अश्क़ तेरी जुदाई के अब किधर जाऊँ ।।


देख आया हूँ दोनों जहाँ कोई नक़्श नही मिला

ढूँढ़ने एक वफ़ा के ज़र्रे को अब किधर जाऊँ ।।


जो खो गया मुझसे तेरी झूठी मोहब्बत में कहीँ

मैं ढूँढ़ने उस अपने आप को अब किधर जाऊँ ।।


चला था दिल की बची साँसे भी ख़त्म करने को

कोई मक़तल ना मिल सका अब किधर जाऊँ ।।