अपमानित हो कर झुको न तुम...

शर्म लज्जा की ओट में छिपो न तुम...

वह द्रौपदी ही थी जिसने भीम को ललकारा था...

वरना पांडवो ने तो सब निशब्द ही स्वीकारा था...


चाहती तो वह दुर्बल और निरीह बानी रहती...

जीवन भर समाज का उपहास सहती...

पर उसके मन ने कुछ और ठाना था...

हो निर्भीक, खुले केशो से हुंकारा था...


रण में उसने भ्रात-पितृ को खोया...

पर शोक में उसने अश्रु एक न बहाया...

प्रतिशोध के लहू से उसने केशो को सुखाया...

तब कहीं पूरी हुयी उसकी प्रतिज्ञा...


तुम क्यों सीता सा खुद का ही दहन करती हो?

क्यों इस समाज की व्याधि में खुद का दमन करती हो?

"मर्यदापुर्षोत्तम" बनाने स्वयं को बलिदान करती हो?

क्यों नहीं तुम वीरो का आहावान करती हो?


न करे कोई पांडव चुनौती स्वीकार...

तो तुम ही क्रोध से करो चीत्कार...

खुद ही तानो धनु की डोरी और ले लो हाथ तलवार...

मचने दो एक बार फिर इन कौरवो में शोक का हाहाकार...