सुन पथिक! तू चल ज़रा क्या है तू यूँ सोंचता ? ये राह तुझको ढूंढ़ती- वो शूल तुझको पूंछता।   मार्ग है प्रशस्त जब तो चाल से क्या डर भला! तोड़ सारी बंदिशें- वक़्त अब भी न टला...   धर स्वरुप विकराल तू तो काल की बिसात क्या? जीत की हों चाहतें- तो हार की औकात क्या।   सोंच मत तू क्या हुआ सोंच मत जो था बुरा, वो लोग गिड़गिड़ाएंगे- देख वो शिखर रहा...   उठ पथिक तू चल ज़रा है कृष्ण! तुझको पूछता, है कौरवों से तू घिरा- वो 'पार्थ' तुझमें ढूंढ़ता।   ये राह ही कुरुक्षेत्र अब यही तो चक्रव्यूह है, है वीर अभिमन्यु! तू- बहा दे रक़्त अब ज़रा...   कर्म कर तू कर्म कर गीता की ये पुकार है, हर क्षण है संग्राम अब ये शत्रुओं की हार है...   चल पथिक तू चल पथिक! 'वो' मूक ही हो जाएंगे- थे रोड़े तेरे राह के जो, स्व-अग्नि में जल जाएंगे।   सुन पथिक! तू उठ पथिक! अब चल भी दे तू यूँ ज़रा...