शाम ढलते ही
शुरू हो जाती है
वो सुनहरी तेरी यादें
करबटें जब भी बदलता हूँ
दब जाती है, तेरी आहे
अब कैसे समझू की तुम मेरे ना हो
दो पल साथ चले थे जो मेरे
उसे क्या मै रहनुमा ना समझू
क्यों भुला दिए वो यादें
जब तुम मेरे कंधे पर अपना सर रख के सोये थे
वो शाम तुम हमनफ़स बोले थे
- sameer shaswat
