कब तक लडता रहु नसीब से,
समय की रफ़्तार से पीछा रह गया हूँ
लोंगो की भीड़ मे कुचल सा गया हूँ
अब लोग जुबान से जुबान नहीं लड़ाते
बस दूर से फासला बनाते
कभी कंधे पर हाथ रख के चलते थे
अब बेरोजगार समझ के
फ़ोन भी नहीं मिलाते
- sameer shaswat


कब तक लडता रहु नसीब से,
समय की रफ़्तार से पीछा रह गया हूँ
लोंगो की भीड़ मे कुचल सा गया हूँ
अब लोग जुबान से जुबान नहीं लड़ाते
बस दूर से फासला बनाते
कभी कंधे पर हाथ रख के चलते थे
अब बेरोजगार समझ के
फ़ोन भी नहीं मिलाते
- sameer shaswat