कितनी बार गिरा,

उठ -उठ के

बचपन में

उँगलियाँ  भी छुटी हर दो कदम में,

पर हिम्मत न हारी

सहनशील क़दमों ने

और

कैसे भूलू  अपनों की

सहारा

जो दिया हर कदम में

चलना तो फितरत में थी

पर पगो की हौसला

क्या कम थी,

घुटनों से पैरों पर चलना सिखाया

वो भी  बचपन क्या  कम थी