जिसने तुम्हे जन्म दिया, वो मां है स्त्री,
जिसने तुम्हारी कलाई पर राखी बांधी ,वो बहन है स्त्री,
जिसने तुम्हारे लिए अपने बाबुल का घर छोड़ा, वो जीवनसाथी है स्त्री,
जिसकी आवाज़ सुनने से तुम्हारी सारी थकान दूर हो जाती, वो बेटी है स्त्री,
जिससे ये विश्व है, वो धरती मां भी स्त्री।
स्त्री का कर आदर तू, वरना काहे का मरद तू?
उसपर ना गरज तू, प्रेमवरुण सा बरस तू।
ना जकड़ तू स्त्री को "स्त्री - मर्यादा" जैसे शब्दों में,
है समाज उद्धार की ताकत उसी स्त्री के करों में।
स्त्री से ही ये जग सुधरेगा,
स्त्री से ही ये जग उभरेगा,
सिवां स्त्री के ना एक फूल खिलेगा,
ना नया गर्भ पलेगा।
स्त्री नहीं है गुलाम किसी की,
अपनी खुदकी भी है एक पहचान उसकी।
जहा स्त्री को समान देखने की बात ही नहीं होती,
जरा सोचो ,वो ना होती तो तुम्हारी ज़िन्दगी ना होती।
- समीर


