ये विशाल समुंदर,
न जाने कितने जीव है इस के अंदर,
किनारे पर बैठा मैं,
और बच्चे गुलाटियां मार रहे मस्तकलंदर,
धरती ने कितना कुछ समा रखा है अपने भीतर,
निसर्ग की मेहेक के आगे फिंके सारे इतर,
लहरों संग हवाएं बादलों को भी धकेल रही,
इन्हीं तुफानी हवाओं में चिल अपने बच्चों संग खेल रही,
मानो वो आकाश को भी तोल रही,
ये धरती इन्सानों से कुछ बोल रही,
बाढ़,तूफान,महामारी से अपने अंदर के राज़ खोल रही,
पर्यावरण का नाश करोगे?
तो बेटा तुम ही इसका जुर्माना भरोगे,
बोलो क्या तुम इस धरा के लिए कुछ करोगे?
उसके संरक्षण के लिए लड़ोगे?
- समीर

