तुम बने सम्यक संबुद्ध,
जीते अपने मन में विचारों के युद्ध,
संदेश दिया तन संग मन भी करों शुद्ध,
चलना है जीवन की राह में सभी को खुद।
कभी नहीं कहा खुदको ईश्वर,
ना ईश्वर का अवतार,
ना देवदूत,
ना ईश्वर सुपुत,
जीवन भर बने रहे मार्गदर्शक।
आग्रह किए करने सब सत्कर्म,
बतलाया सबको मनुष्यता ही श्रेष्ठ धर्म।
नष्ट होगा एक दिन ये शव,
सिखा दिया होना "अतः दीप भव।"
- समीर


