आज पता नहीं क्यूँ दिल उदास था
मन भी था कुछ भारी भारी
कुछ कड़ुवा सा
कुछ शर्मिन्दा
अपने आप से
ऐसे में चुपके से पढ़ डाली
मैने कविता तुमहारी
एक एक शब्द सचे थे
कैसे पिरो दिया था तुमने
एक एक मोती को धागे से
मन तो होता बावरा है
जब भी सोचेगा
खुद की ही सोचेगा
सोच रहा था अभी भी खुद
क्यूँ मिल जाता है तुझको
वो सब जो चाहिये मुझक
मेरे हिस्से की सब चाहत
मेरे हिस्से का सब वो साया
फिर अचानक तेरी कविता
बूंद बूंद जब बरसी जब मुझ पर
भीग गया अंतर मन मेरा
शांत हो गयी सब ज्वाला
शीशे जैसा साफ हो गया
मन मेरा अब पाक हो गl