शब्द "दाग"
तुम्हारे साथ भाषा, समाज और कलाविधा ने
अन्योचित व्यवहार किया है।
नकारात्मकता की पराकाष्ठा,
उपेक्षा का रसातल और
बदनामी ही
तुमको आभार किया है।
पर क्या यह सही है?
और हां,
तो धर्मकांटे पर इसको आज तौला जाए,
कुछ और भी मतलब है तुम्हारा,
तो वो द्वार भी खोल जाए।
शायर जिस चांद में प्रेमिका को देखता रहा,
उसमें भी दाग है।
मां के आंखों का काजल
टीका बनके जो आता रहा,
वो भी तो दाग है।
दुल्हन के हाथों की छपाई
जो हर घर में बनाई जाती है,
कितना सुंदर दाग है।
प्रेमपाश में एक दूसरे के बदन
पर उकेरी गई निशानी,
कितना शर्मिला दाग है।
जिस रंगी उँगली से प्रजातंत्र में
भाग्य निर्धारित होता है,
बड़ा सशक्त दाग है।
बच्ची की नन्ही कूँची से
दीवारों पर इबारत सजाना,
कैसा मासूम दाग है।
शब्द "दाग",
तुम इतने भी बुरे नहीं।