मेरे गाँव
के ढहते स्कूल में
दफ़्न हैं-
पास से बहती
बैंती नदी की उच्छृंखलता
धूल -धूसरित सड़कों का अट्टाहास
मंदिर की घंटियों का कलरव
कुएँ की पानी की शीतलता
खेतों के पेट से उगता सरसों
और
गोधूलि में लौटता बैलों का जोड़ा।
पर जो नहीं है
वो है-
बच्चों की शरारत
स्लेट से छेड़खानी करता खिपटा *
किताबो में छिपे हर्फों* की गर्माहट
सूर्य-नमस्कार करते कोमल हाथ।
क्योंकि
स्कूल कभी बना ही नहीं
जब बना तो खँडहर ही बना।
सलिल सरोज
खिपटा *-खपरैल का छोटा टुकड़ा
हर्फ*-अक्षर