क्यों सुनने लगे हो सबकुछ
क्या गलत सही का भेद नहीं
या चुप रहते हो तुम भी अकसर
इसलिए जरा भी खेद नहीं
क्या मुँह मोड़ दिया है तुमने
अपनी अड़िग वाणी से
या तीर हो चले हैं विसफल
धरी पड़ी कमानी से
कहीं मूकदर्शक बने रहना
तुमने तो नहीं सीख लिया
या चेतनशून्य बने रहने का
तुमने भारी भीख लिया
ये वख्त नहीं के मौन रहो
चाहे करलो तुम मुझसे बैर
जो हो कहीं भी बुरी प्रवित्ति
तुम क्षण भर में लो उसकी खैर
---सलिल पन्त


