ऐसे क्यों फूट पड़ी हो आखिर
दुल्हन की विरह वेदना सम
कुछ और माजरा है याफिर
बोलो तो कुछ खाओ कसम
क्या माँ की है याद आ रही
संग बाबुल से छूटने का गम
या सखी सहेली, भैया-भाभी
की यादों से आंखें हैं नम
क्या सोच रही हो कैसा होगा
पति का घर होगा न मैके सम
या फिर पिता के कर्ज का कहीं
बोझ तुम्हें न कर रहा हो नम
कुछ तो बोलो आँखे खोलो
बस बरस रही हो झमा झम
कुछ और माजरा है या फिर
बोलो तो कुछ खाओ कसम


