मैं और मेरी बहन आज दिल्ली की यात्रा पर थे...।
रेलगाड़ी का general महिला कोच और हमेशा की तरह uppersheet........
कोच आज खाली सा था नीचे वाली सीट पर कुल 5 अनजान महिलाएँ और रात का सफर........!
मैं आराम मुद्रा में आई ही थी कि ...महिलाओं की आपसी चर्चा शुरू हो गई । किसी ने ठीक ही कहा है जब चार महिलाएं मिले तो मजाल है कि एक क्षण भी कोई चुप रह जाए....।
बहन जी कहीं से आ रही हो या कहीं जा रही हो ....?एक महिला ने पूछा ...। इतना पूछने की देर ही थी कि बस दूसरी महिला बड़े प्रवाह में अपनी आपबीती सुनाने लगी। जैसे कि वह चाहती ही थी कि, कोई पूछे और मैं बह जाऊँ.. ......क्या करूं बहनजी, मैं अपनी बहन के घर से आ रही हूं।बेचारी बहुत परेशान है.. उसकी सास से तंग आ गई है, समय पर खाना तक नहीं मिलता और ऊपर से गर्भवती भी।
.....फिर क्या था तीसरी महिला भी सुर से सुर मिलाती हुई बोल पड़ी, कि हाँ! हाँ! .. सास तो होती ही है ऐसी ....अब मुझे ही देख लो, मेरी सास तो तंज कसने का एक मौका भी नहीं छोड़ती ...और इस तरह बातों का वह क्रम जारी रहा...। एक-एक करके सभी बड़ी निर्ममता से लहूलुहान करती गई 'सास' शब्द को। निंदा रस पान का आनंद उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। आखिर जीवन की अथक गतिशीलता से परे कुछ क्षण ही तो मिलता है उन्हें अपने लिए , अपने आप को हल्का करने के लिए ......।
.......और इन सब के बीच मैं ना चाहते हुए भी ऊपर से चुपचाप सब देख-सुन रही थी... बस इस अनवरत आपबीती के खत्म होने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी कि, मेरा ध्यान चेहरे पर प्रसन्नता का भाव लिए चुपचाप बैठी एक महिला पर गया।
मैनें सोचा कि आखिर वह पांचवीं महिला क्यों कुछ नहीं बोलती...? क्या उसे बाकी सब की तरह निंदारस पान करने में कोई रुचि नही ...? अपने इन मानसिक प्रश्नों का उत्तर आप ही देते हुए एक-दूसरे मन ने मुझसे कहा - 'हो सकता है उसकी सास उसकी फिक्र करती हो , उन दोनों में आपसी संबंध बेहतर हो.....! अब हर सास बुरी थोडे ही होती होगी।'
मेरे मन का समुद्रमंथन उस वक्त समाप्त हुआ जब किसी ने उससे पूछ ही लिया - उसकी चुप्पी का राज़...... बेटा तुम भी कुछ बोलो ...अपने मन की भड़ास निकालने का इससे अच्छा अवसर फिर नहीं मिलेगा। क्या तुम्हारी सासूमां तुम्हे समझतीं हैं ..? क्या तुम्हारा काम में हाथ बटाती हैं ..? क्या मां की तरह प्यार की थपकी देती हैं.....?
अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कुछ हिचकिचाते लहजे में वह बोली-- 'अरेsss.. नहीं ,नहीं! बहन जी, आप गलत समझ रही हैं ; बात यह है कि..... कि मेरी सासूमाँ मेरी शादी से पहले ही गुजर गई थी...।
ओह! तो यह बात है, तभी मैं सोचूं sss...
अब मैं भी इन सारी निपट घरेलू बातों से ऊब चुकी थी । धीरे से हिम्मत करके मैंने बोल ही दिया - "हैलो! आंटी .....आपलोग थोड़ा धीरे बोलिए ना,,,,, प्लीज......!
कुछ क्षण तो सन्नाटा पसरा रहा फिर...
.......फिर एक लगभग प्रौढ़ावस्था की अंतिम सीढ़ी पर खड़ी महिला बोली -- 'बेटा तुम्हें भी सुनना चाहिए हमारी बातें ....आखिर तुम्हारी भी तो कभी शादी होगी और तुम्हें भी तब यही सब झेलना होगा तब काम आएगी हमारी बातों में छुपी छोटी-छोटी सीखें।'
वो तो इतना बोल कर चुप हो गई, पर एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आई कि- वो इतने विश्वास से यह कैसे कह सकती थीं ? क्या यह उनकी और उनके जैसी महिलाओं की किसी एक रिश्ते के प्रति दृढ़ पूर्वधारणाएं थीं ....? या उनके खट्टे , हर बार के खट्टे अनुभव का परिणाम ....! या फिर क्या हर मध्यमवर्गीय स्त्री की यही कहानी है......? कितनी स्थाई , सहज और नादान खिन्नता छिपी थी उस एक शब्द 'सासूमाँ' में ........!
और मेरे मन की ईड़ा और श्रद्धा एक बार फिर जाग गई .............।।
....✍साक्षी पाठक
03-07-20


