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मित्र और संघर्ष

मित्र मेरा संघर्ष कर रहा,
दिन रात अपने से जूझ रहा,
दोष उसका सिर्फ इतना है,
सिद्धांतों से ही आगे बढ़ना है,
व्यवहारिकता से वो दूर है,
नियमों से वो मजबूर हैं,
निपुणता की वो पहचान है,
पूर्णता में ही उसकी शान है,
दिल से वो कमजोर है,
भावों से वो विभोर है,
अपने कष्टों से बेखबर,
दूसरों की वो शहतीर है,
अश्रु उसके दिखते नहीं,
वाणी भी उसकी शांत है,
होठों पर मुस्कराहट है,
विश्वास की वो आन है,
इन आवरणों के अन्दर,
ग़मों का पुलिंदा भारी है,
वक्त करामात करता रहा,
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