आज मन मेरा फ़िर कुछ कहना चाहता है लौटकर पुराने दौर में जाना चाहता है मन है मेरा बांवरा, फ़िर पलायन चाहता है.... तंग आ जाता है कभी ईमेल और मैसेज का शोर से चुपके से नए पुराने ख़त पढ़ना, सहेजना चाहता है जब चुभती है आवाज़ फ़ोन और मैसेंजर की तब बैठ बरामदे में डाकिये की राह देखना चाहता है मन मेरा .......फ़िर पलायन चाहता है..... याद है वो तड़प जो होती ख़ास गीत सुनने के लिये वो मज़ा..वो रूहानियत फिर से जगाना चाहता है मौसिक़ी उंगलियों पर हासिल देख लिया लेकिन उसे फ़िर रंग-ए-कसक से रंगना चाहता है मन मेरा .......फ़िर पलायन चाहता है..... ऊब चुका है शहर की अजनबी सी भीड़ से अब फिर गांव में अपनों के साथ रहना चाहता है रास नहीं आते इसे अब बड़े बाज़ारों के मेले घर के अमिया की डाल पर, झूला लगाना चाहता है मन मेरा ......फ़िर पलायन चाहता है..... आयाम नए पा लिए, विज्ञान को भी देख लिया ज्ञान फ़िर उसी वट वृक्ष की छाँव में पाना चाहता है ज़माने के लिए होंगी चाँद, मंगल पड़ोस की बातें ये पृथ्वी की परिधि को ही फ़िर नाप लेना चाहता है मन मेरा .....फ़िर पलायन चाहता है.... कितना आसान हो चला है जग में कुछ भी ढूंढना कुछ तलाशने की कशिश फिर जगाना चाहता है बहुत कुछ हासिल हो गया सफलता हो चली पुरानी अब फिर नए सिरे से सादा जीवन बिताना चाहता है मन मेरा .......फ़िर पलायन चाहता है.... आज मन मेरा फिर कुछ कहना चाहता है लौटकर पुराने दौर में जाना चाहता है मन है मेरा बांवरा .....फ़िर पलायन चाहता है....