ख़ामोशी फुर्सत में करती है गुफ़्तगू खामोश लफ़्ज़ों से कहती है वो सारी बातें जो कभी कह न सकी औरों से
इतना आसान भी कहाँ होता है कुछ भी लिख देना बिना महसूस किये तुम्हें बेवजह कागज़ पर रख देना
चाहती हूँ कि लिखूँ कुछ अपने तजुर्बों से परे भी कभी लेकिन नाक़ाम रहती हूँ तुम हो कि इजाज़त देते ही नहीं
जब लाते हो तुम जब अपनी रंगत कोरे कागज के लिए रह जाती हूँ तुमको मैं अपने जज़्बातों से बांधते हुए
कई दफ़ा कहा है तुमको कभी यूं भी चले आया करो कोई ग़ज़ल.. नज़्म.. कविता या रुबकाई बन जाया करो
लफ़्ज़ों ने बड़े अदब और अंदाज़ से कहा मुझको ....
जब कभी कोई आह दिल से निकलेगी .... जब कोई दुआ लकीरों में महकेगी...
कोई तज़ुर्बा यादों में जगह बनायेगा या यकायक कोई बिछड़ा याद आएगा...
और कभी यूँ ही कोई वाकया ज़हन में जिंदा हो जायेगा ... या कोई सोया ज़ख्म ताज़ा हो जाएगा
तब हम भी चल कर आएंगे .... रंग सारे साथ लाएंगे... और बिना किसी इजाज़त के कागज़ पर बिखर जाएंगे ..... तब अपने सारे जज़्बातों से बस बाँध देना तुम.... कोई ग़ज़ल... नज़्म या एक नयी कविता बन जायेंगे...!!


