कितनी अजीब अनुभूति होती है जब किसी बेहद अपने और स्वयं के मध्य ख़ामोशी की दीवार हो जाती खड़ी है ..... स्वाभिमान और अहं बार बार रोक देता है मुझे इस दीवार को गिराने से..... एक चुप्पी साध कर रह जाते हैं दोनों शब्द हृदय से निकल कर होंठो तक तो पहुँच जाते हैं पर उससे आगे नहीं बढ़ पाते... खुली हवा में विचरण करना चाहते हैं शब्द आज़ाद पंछियों की तरह ... किन्तु मैं रोक देती हूँ उन्हें बंद कर देती हूँ एक पिंजरे में.. पंछी की तरह शब्द छटपटाते हैं दर्द भी होता है.... फिर भी न जाने क्यों दर्द सहती हूँ शब्दों के दम टूटने की प्रतीक्षा करती हूँ.....