हम तार्रुफ़ रखते हैं दर्द से , इतना ही काफ़ी है.....
अब हर रोज़ तस्लीम हो ....ये ज़रूरी तो नहीं...!!
कुछ नाकामियां , कुछ अधूरे ख्वाब हैं दामन में...
लेकिन आँखें भी हो नम... ये ज़रूरी तो नहीं...!!
गर वक़्त बदला, शहर बदला, कहानी बदल गयी...
ज़मीर का किरदार भी बदले ....ये ज़रूरी तो नहीं...!!