दीवारों पर बदलती तारीख़ें
मन की दीवारों पर
इबारतें उतार जाती हैं....
कुछ ख़ुशी की ....कुछ गम की
कुछ जश्न की ...कुछ मातम की
कुछ जलसे की... कुछ तन्हाइयों की
कितनी कहानियाँ छोड़ जाती हैं...
रह जाते हैं मन की पुरानी दीवारों पर
उन सब के कुछ उजले धुंधले साये
कोशिश कर लो लाख दफ़ा
ये न मिटते ... लाख मिटाये
दरख्तों के झुरमुट से जैसे
धूप छन छन कर आती है
यादें भी तो ऐसे ही कुछ
ज़हन को रौशन कर जाती हैं
गुजरे हुए पलों के फूल लिए
कुछ यादें तो हरी बेल सी चढ़ती हैं
कुछ यादें काटों सी चुभती
लाख काटो ..पर फिर भी उग पड़ती हैं
क्या क्या छोड़ आयी हैं
मुड़कर देखती भी नहीं
बस यूं ही तारीख़ें गुजर जाती हैं ....
नए साल में नया लिबास लिए
नए ख्यालों, नए सवालों को साथ लिए
अनदेखी इबारतों की नयी सौगात लिए
हर साल लौट आती हैं
तारीख़ें .....साल दर साल ....
फिर नए कैलेंडर में छिपकर
अपनी बारी का इंतज़ार करती
दीवारों पर लटक जाती हैं....!!