एक ज़ख़्म दिया मेरे अज़ीज़ का बन गया अज़ीज़ सा न रिसता है ..... न भरता है .... न कुछ कहता .....न वो सुनता .... बस ख़ामोश सा पलता रहता है ...... आखें उसकी प्यास बुझाती ..... फरियादें मरहम लगाती .... फिर भी वो न जाने क्यूँ .... कुछ नाराज़ सा ही रहता है.... दर्द जब अपनी हद पर आता ...... एक कलम थमा वो जाता ... और शब्दों की भीड़ में..... निशब्द मुझे कर जाता है ...... एक ज़ख़्म अज़ीज़ सा..... एक ज़ख़्म मेरे अज़ीज़ का..... मुझ से अक्सर यूँ खेल जाता है ......