चाँद की तरह हो मुझे कभी दिखती हो
कभी रहती कहाँ हो...
मैं चलता रहता हूँ पागलो की तरह तुम्हे पाने की आस में...
ए बेखबर बताओ न तुम मिलती कहाँ हो।।
भूल भुल्लैयों का शहंशाह
कहते है मुझे...
परेशान हूँ ये सोचकर
कि सामने रहकर भी तुम छिपती कहाँ हो !!
रफ़्तार बचाकर रखी है ..अपने हाथों में
मैंने....
बस मायूस हो जाता हूँ जानकर ये..
कि तुम एक जगह टिकती कहाँ हो...!!
चाँद सी हो...कभी दिखती हो
कभी रहती कहाँ हो...