"तो ये तुम्हारी परवरिश की कमी है"
अगर तुम राह चलती हुई लड़की को
इज़्ज़त से नही देखते।
तो ये तुम्हारी परवरिश की कमी है।
अगर उस में बस एक सहमा हुआ बलि का जानवर ही नज़र आता है।
तो ये तुम्हारी परवरिश की कमी है।
अगर तुम सिर्फ उसके कपड़ों को उसके स्कर्ट को उसके बिना दुपट्टे सीने को देखते हो।
तो ये तुम्हारी परवरिश की कमी है।
तुम्हारे संस्कार ने तुमको क्या सिखाया है?
जिसको तुमने अपनी तहज़ीब बनाया है
तुम्हारी घर की औरत को कोई और इस तरह देखे।
तो मरने मारने पे क्यों तैयार हो जाते।
तब क्यों तुम्हे तुम्हारे संस्कार याद आ जाते।
क्यों के तुमने सीखा ही नही औरत को इज़्ज़त देना।
क्यों के ये तुम्हारी परवरिश की कमी है।
क्यों ज़िन्दगी देने वाले पेड़ को खुद काट देते हो?
अगर बेटी है पेट में तो अजन्मी मार देते हो।
अरे! सुन लो बेटियां तुमको पीछे छोड़ चुकी हैं।
तरक़्क़ी की मशाल ए राह लेकर चल पड़ी हैं।
तुम सोचो तुम कितना पीछे रह गए हो।
क्योंकि ये तुम्हारी परवरिश की कमी है।
तुम्हारा किरदार तुम्हारे कुनबे का पता देता है।
जो कुनबा बचपन में हर बात सिखा देता है।
औरत एक मां एक बहन भी है।
और राहत का सायबान भी है।
तुम्हे ये तालीम मिली ही नही
क्योंकि ये तुम्हारी परवरिश की कमी है
ऐ औरत क्यों ऐसी परवरिश देती है।
अपनी दोगले पन से तू फ़र्क करती है।
लड़के को लड़की से ज़्यादा प्यार देती है।
उसी प्यार से तू उसे बिगाड़ देती है।
बचपन के बेटा लड़का लड़की का फर्क जान जाता है।
क्या कभी सोचा तूने इसमें भी तेरा ईमान जाता है।
फिर समाज में वो एक कहर बरपा करता है।
क्यों कि ये तेरी परवरिश की कमी है।
ऐ औरत जो तूने अपने औलाद को दी है।
Saira Isar समीना


