मैं कौन हू्ँ?


मैं कौन ह्ँ?

मनुष्य की यह जिज्ञासा...

क्या में आदि हंँ?अंत या अनंत हँ?

क्या मैं नभ का विस्तार ....

या धरा सा सहज प्रकृति का आभास।

कभी जडता है। कभी चैतन्य का होता संचार।

क्या मैं माया का पाश ह्ँ?

या ममता की सजीली डोर हूँ?

क्या जीव सहज लज्जा ह्ँ?

या क्षुधा, तृष्णा, जिजिविषा का रूप मात्र हूँ।

क्या बिंदु का रूप धरूँ? या रेखा चित्र सहज हू्ँ।

रस तत्व का महत्व क्या जान्ँ?

रंगों का प्राधान्य क्या पहचानूँ?

मैं कौन हूँ? मेरा अस्तित्व क्यों है अनोखा?


तभी सर्वव्यापी शक्ति की उक्ति...

मुझसे न तुम भिन्न हो।

ना ही तुम अंत आदि से बंधे हो।

तुम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बद्ध हो।

गुण, काल, रूप से बंधे हो।


तुम मेरे व्यक्त रूप हो।

कार्य-कारण से गुंथे हुए हो।

तुम्हारा अस्तित्व मुझसे अभिन्न है।

मैं शून्यत्व से परिपूर्ण हूँ।

मैं अव्यक्त हूँ। मैं काल हूँ।

तुम्हारा अस्तित्व मुझसे अभिन्न है।

आत्मा, परमात्मा का संबंध को दर्शाता

विलीन हो रही 'मैं' की खोज 'ओम'कार तत्व में।

अहम् ब्रह्मास्मि....के अंतर यात्रा में।

     अर्चना शेणै के।