बड़ी मुद्दतों के बाद अपने आप से हाल पूछा

न जाने क्यूं कुछ नया सा लगा

लगा कि जैसे पुरानी तस्वीरों से धूल हटा दी

कैद विचारों को जैसे पंख मिल गए हो

अपने आप से बात की तो जाना

शोर और खामोशी

दोनों ने अपनी जगह बना ली थी

हैरानी और परेशानी ने भी अपने कमरे ढूंढ़ लिए थे

लोगों को जानते पहचानते

खुद से ही अनजान हो चुका था

कुछ रिश्तों से सिर्फ घाव मिले थे

तो कुछ मरहम की तरह थे 

इन सब में उम्र का पता ना चला

मगर अब भी एक अरसा है बाकी

और है कुछ कमरे भी खाली

अबकी बार कुछ अच्छी यादों को कैद करना हैं

और कुछ अपनों को पनाह देनी हैं

ताकि जब फिर से अपना हाल पूछूं

तो आंखों से आंसू खुशी के हो।।


   

- साईं नयन धोरिया