चलो एक और कृति,
उस अवर्णनीय सुन्दरता को समर्पित कर दूं।
जो शब्दों में न कह पाया,
उसे अक्षरों में उसे अर्पित कर दूं।
सुन्दरतम तुम्हारा मुखारविंद,
दुबला - पतला तन,
मोहिनी इस सूरत पर मोहित मेरा मन।
सुन्दरता की नश्वरता तुम्हारा वहम मात्र है ,
अपने काव्य में समाहित कर,
आज इस वहम को दूर कर दूं।
चलो एक और कृति उस,
अवर्णनीय सुन्दरता को समर्पित कर दूं।
जिसने भी कहा है, सही कहा है ।
कि प्रेम है एक मर्ज़,
प्रेमी होने के नाते,
यही मेरा फर्ज़।
इस कदर डूब जाऊँ तुम्हारे प्रेम में ,
कि खुद को इस मर्ज़ से संक्रमित कर दूं।
चलो एक और कृति उस,
अवर्णनीय सुन्दरता को समर्पित कर दूं।
जो शब्दों में न कह पाया,
उसे अक्षरों में उसे अर्पित कर दूं।
-- रोहित शर्मा
सीकर, राजस्थान


