पिता
सच्चे इरादे से पाला है जिसने
पल पल राह में सम्हाला है जिसने
ना दे कर मिठी मिठास प्यार की
कडवहट से अमृत पिलाया है जिसने वक्त पर चलना और वक्त पर लिखना सिखाया हैं जिसने
ताप कर पसीने में हम को महकया है जिसने पल पल जीना सिखाया हैं जिसने
क्या है हम और क्या थे हम,
इस राह से उस राह तक पहुचाया है जिसने ना बिता कर समय जिसने हर समय खून पासीना बहाया है जिसने
भले ही ना पड़ा हो वो खूद भी फिर भी और फिर भी हमको पडा़या है जिसने
नाम दिया है अपना इस कबिल हमको बताया हैं जिसने
खूद भाले ही रोया है
पर भी हर बार हँसाया हैं उसने
पिता कह लो या कह लो पापा इनको, हर बार खूद सिने से लगा कर परिवार को बचाया हैं इसने
ये सौनिक है परिवार का हर
दुश्मन को मर गिराया हैं इसने
रूप होगे अनेक इनके,
मगर दिल से पिता बनकर
दिखाया है इसने
कड़वा ये बोले तो सुन ही लेना
हर मिश्ररी से अमृत बानाया हैं इसने.....................
साक्षी यादव.......
