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फीका चाँद


हमें वो कब समझते थेउन्हें हम कब समझते थेमगर जो कुछ नहीं थे वोवही सब हम समझते थेचमक औरों की वो निकलीजो उस रूख़ से टपकती थीवो फीके चाँद ही निकलेजिन्हें सूरज समझते थे- साहिलTwitter: @Saahil_77

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