जो बनते थे सूरज, हैं टूटे सितारे

ये रहबर हमारे, बड़े बेसहारे


जो हमको बताते थे तूफां से खेलो

वो ख़ुद चल पड़े हैं किनारे-किनारे


परिंदों को इंसा ने पिंजरे में बाँधा

गगन चूमती हैं इमारत मीनारें


भंवर में फंसे तो भंवर खींचता था

किनारे पे आए तो डूबे किनारे


निगाहों पे पर्दे, ज़ुबानो पे ताले

शहर में अमन है इन्हीं के सहारे


- साहिल

Twitter: @Saahil_77