सच यही बस खरा-खरा सा है 

जेब ख़ाली है दिल भरा सा है


खोटे सिक्कों का बोलबाला है 

जो खरा है वो कुछ डरा सा है


नफ़रतें ओढ़ता बिछाता है

आदमी दिल से क्यूँ मरा सा है 


तुम जो अक्सर कुरेद देते हो

ज़ख्म अब तक हरा-हरा सा है


जाने कितने शहर उजाड़ेगा 

ये जो तूफ़ान सरफिरा सा है 


-साहिल 


Twitter: @Saahil_77