पाँच साल के कुम्भकर्ण, जगे चुनावी साल l  

मंदिर-मस्जिद गूंथ के, बुनते तगड़ा जाल ll


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मीठे-मीठे झूठ पे, सच का वरक़ लगाय l

उजला खद्दर ओढ़ के, कालिख लिये छुपाय ll


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माटी पैरों में सनी, नेता दिए धुलाय l

साल चुनावी जो गया, गये खेत सब खाय ll


-साहिल

(Twitter: @Saahil_77)