पैदा हुए,

तालीम ली,

फिर चाकरी,

और पेंशनी,

अब तक की

जितनी लाइनों में

तुम खड़े थे,

तुम आंकड़े थे,

आंकड़े थे,

आंकड़े थे...


जब जात और

मज़हब के

तमगे से सजे,

उन वोटरों की

लाइनों में

तुम खड़े थे,

तुम आंकड़े थे,

आंकड़े थे,

आंकड़े थे...


भगदड़ थी या

भूचाल था,

कोविड था, बाढ़,

अकाल था,

सड़कों पे

जब निर्जीव,

औंधे मुंह पड़े थे,

तुम आंकड़े थे,

आंकड़े थे,

आंकड़े थे...


बीते हज़ारों

साल से

इस दिन, महीने

साल तक,

दीवार पर लटके

जो फ़्रेमों में

जड़े थे,

तुम आंकड़े,

बस आंकड़े,

बस आंकड़े थे...


- साहिल

@Saahil_77