पढ़ा अख़बार तो तसल्ली हुई

कहीं कुछ भी ग़लत हुआ ही नहीं 

लोग झूठे हैं, कुछ भी कहते हैं 

किसी का कोई भरोसा ही नहीं

सुना कुछ साये थे, मशाल लिए

जिनके हाथों से कुछ बचा ही नहीं

रात कितने मरे, तबाह हुए

इसका भी कोई आंकड़ा ही नहीं 

होगी अफवाह, हाँ, वही शायद   

किसी अख़बार में छपा ही नहीं 

आज की ताज़ा ख़बर कहती है 

कुल शहर नूर था, धुआँ ही नहीं  

पढ़ा अख़बार तो तसल्ली हुई

कहीं कुछ भी ग़लत हुआ ही नहीं

-साहिल 


(Twitter: @Saahil_77)