ये दुआ करना
महरूम हैं जो सूरज की रोशनी से
अँधियारों से निकल आयें
सहम कर खौफजदा दुबके बैठे हैं जो
निडर बन बेखौफ हो जाएँ
ये दुआ करना
भूखे पेट मेहनत कर दूसरों को खिलते हैं जो
दो वक्त की रोटी जुटा पाएँ
किसी के रहमोकरम पे जी रहे हैं जो
आत्मनिर्भर बन जाएँ
ऊंचे ओहदों पे बैठकर जुल्म ढा रहे हैं जो
कर्तव्यनिर्वाहन सीख जाएँ
कठपुतली बन इशारों पे नाच रहें हैं जो
गिरफ्त से आजाद हो जाएँ
दलित-ब्राह्मण, हिन्दू-मुस्लिम कह कर
जाति-धर्म के नाम पर लड़-झगड़ रहे है जो
मज़हब कोई नहीं सब इंसान हैं
इससे वाकिफ हो जाएँ
किसी महत्वाकांक्षा में भ्रूण हत्या कर रहे हैं जो
बेटियों का महत्व समझ पाएँ
ये दुआ करना