उम्र से दोगुने उस आदमी के

हाँथ थामते ही वह रुकी

चेहरा झुकाकर

दबे होंठो से बोली,

सुनो आज मैंने कुछ खाया नहीं

सुबह से कोई नहीं आया आज

पाँव जड़ से हो गए हैं !

तुम्हारी भूख शांत हो जायेगी बेफिक्र रहो ! मेरी देह तो तुम्हारी ही है

पूरे पैसे जो दिये हैं तुमने

खैर !

हम दोनों इस वक़्त एक ही स्थिति में है तुम्हें देह की भूख है मुझे अन्न की भूख है | थोड़ा वक़्त दो तो कुछ खा लूँ

फिर चलें अपने काम पर

अगर इजाजत हो तो ही !

गर न कह दोगे फिर भी चलूँगी

भूखे पेट तुम्हारी भूख शांत करने

तुम ये न सोचना मे टाल रही हूँ

या धोखा दे निकल जाऊँगी,

साहब हम देह बेचते हैं

अपना ईमान नहीं बेचते !

हमारा रोज का ही काम है

कोई न कोई आता है

हाँथ पर पैसे रखता है

कलाई पकड़ ले जाता है,

बिना आनाकानी के चली जाती हूँ बंद कमरे में

अब तो आह भी न निकलती है

चीखे तो कब की दफना दी

बदन भी अब छटपटाता नहीं

विस्तर भी शिकवा नहीं करता

पहले रोज के असहाय दर्द के बाद सर से पाँव तक पूरा बदन दलदली तालाब हो गया है ईंट, पत्थर, धारदार औज़ार सब बेअसर हो जाते है हर रोज सबकी भूख शांत करने के बाद भी

मेरी पेट की भूख जिंदा ही रहती है

इंसान, जानवर, परिंदों से अलग

सभ्यता के अखाड़े में

इन्हें वैश्या कहते हैं