इन उड़ते धूल में खुद को खपा रहा हूं

खुद से मैं खुद को बस यूं सता रहा हूं

मंजिल नहीं मेरी ये ना पड़ाव है मेरा

मेरी मंजिल कहीं और उस ओर जा रहा हूं,

जो मेरा पड़ाव नहीं है उस पर ठहरना मुश्किल

छोड़ आगे बढ़ जाना अपना है मुस्तकबिल

सोच कर कल क्या हो उससे क्या घबराना

जीवन में कभी कांटे तो कभी फूल मुस्कराना ।।