सहारे जब किनारा कर लेते हैं
इंसान बेसहारा हो जाता है,
रिश्तों की भीड़ में भी
खुद को अकेला पाता है ।
एक आवाज जो जीने की आरजू
मैं हूं ना ! बस यही जीने की जुफ्तजू,
कोई किसी के हाथ थाम सदा नहीं
चलता,
कुछ कदम के बाद खुद को चलना
पड़ता ।।

सहारे जब किनारा कर लेते हैं
इंसान बेसहारा हो जाता है,
रिश्तों की भीड़ में भी
खुद को अकेला पाता है ।
एक आवाज जो जीने की आरजू
मैं हूं ना ! बस यही जीने की जुफ्तजू,
कोई किसी के हाथ थाम सदा नहीं
चलता,
कुछ कदम के बाद खुद को चलना
पड़ता ।।