फासले इंसानियत के यूँ ही,
बढते गये,
समाज में इंसानियत के,
रिश्ते यूँ बिखरते गये,
जाति धर्म,मन्दिर मस्जिद,
में ऊलझ गये रिश्ते सभी,
समाज में भेद भाव
यदि यूँ ही बढते गये,
ढह जाएंगे सामजिक रिश्ते,
आपसी सदभाव के
बुनियाद ढह के रह गये,
मत करो मजहबी उन्माद
सौहार्द्र का विस्तार हो,
वरना हमारे सामजिक रिश्ते,
फासलों में मिट कर बह गये ।।

