आज मन बड़ा बेचैन है
जैसे कुछ खो गया कहीं
शायद सुकून और चैन है,
स्वार्थ और भय से भयभीत
हम सब कुछ देखकर भी नहीं देखते
क्योंकि आम इंसान आंखे मूंदे बैठा है,
कुछ सुनता नहीं कुछ देखता नहीं
निष्प्राण प्राणी जिसका जमीर
किसी अमीर की तिजोरी में कैद है,
वह बस इंसान होकर भी इंसान नहीं
एक बेजान बुत, एक बेजान बुत।।

