क्या करूं कैसे कहूं
अपने दिल के जज्बात को
देखता हूं जिस तरफ काली अंधेरी रात को
रोशनी का एक भी कतरा नजर आता नहीं
जैसे किसी शमशान पर
सन्नाटा तिमिर भाता नहीं।
हाथों की हथेलियां भी एक अजनबी की
सी लगती रही
खुद का अस्तित्व भी बेजान परछाई बन
डसती रही ।
कब तलक जिंदगी अंधेरों छाया में रहे
एक झलक जुगनू की जज्बात में पलता रहे ।।
Posted bySahdeosingh