एक हक की क्या बात की

उसने मुझे तबाह कर डाला,

जब जीत का सेहरा बंधा था,

फलक पर बैठा हमें इज्जत अदा

कर डाला,

आज हम एक न्याय की गुहार

लगाए बैठे हैं,

तो हमें गुनहगार बना डाला ।

क्या हमारा साहब इतना बेदर्द है

की अपनी बेटियों को ही रुसवा कर दिया,

एक बार हम पर भी नजर डाल देते तो

शायद हमें भी इंसाफ का नजराना

मिल जाता ।।