दोराहे पर खड़े हो देखते इधर उधर

दोनो तरफ है मुश्किल जाएं किधर

इंसान आज परेशान है मंजिल से अनजान

कोई उम्मीद की रोशनी दिखाती नहीं जनाब

हर शख्स के चेहरे खुद से करे सवाल

इन मायूसियों के बन में भटक रहे आम इंसान ।

हर आयु हर वर्ग बूढ़ा हो या जवान

अनिश्चितताओं के भंवर जाल में उलझा हर किरदार

किससे सवाल करे कैसे पाएं अपनी मंजिल

हर तरफ नफरतों का सैलाब है शामिल ।।