अपने लिए कभी हमने किसी को
रुसवा नहीं किया,
अपने ही लोगों ने मुझे तनहा कर दिया,
तन्हाई का ये आलम कांटे सा चुभ रहा है
अकेलेपन का हर पल सदियों सा लग रहा है,
जिस पर अधिकार समझता था वो दूर हो गए
अनजाने लोगों में खुद से तनहा हो गए,
अब तो सबर का बांध टूट रहा है
सब छोड़ छाड़ कर हम घर लौट रहा है ।।

