अंतिम शब्द हैं अंतिम प्रयाण का
जीवन के जलते बुझते विराग का
वैसे तो किस्मत की लकीरों को कोई
मिटा नहीं सकता
इंसान तो क्या भगवान की झुका नहीं सकता ।
माथे की सिलवटों में जीवन की गूंज है
जिंदगी की लकीरों की घटती अनुगुंज है
जो सांसे चल रही कब टूट जाएंगी
बस अंतिम शब्द की कड़ी छूट जायेगी ।।
Posted bySahdeosingh