तब, कुछ कर जाने की आस थी,
मज़िल बहुत दूर, फिर भी कुछ पास थी।
अब बहुत कुछ पाकर, कुछ खो देने का एहसास है,
एक बीज से पौधा उगाया, अब पेड़ बनने का आगाज़ है।
तब, ख्वाब बड़े, सीढ़ियां छोटी, चढते चले गए,
अब, सीढ़ियां बड़ी और ख्वाब ढूंढते रह गए ।
तब, एक परिंदा खुले आसमान की ऊंचाईयां माप रहा था,
अब, आसमान में भी दीवारों की गहराईयां भांप रहा है ।
तब, हमारी छोटी कश्ती, बेफिक्र चलाते चले गए,
अब, जहाज है पर, पानी की उछाल से डर गए।
तब, एक कुटिया में सर्द, वर्षा सबकी खुशिया लिए,
अब, बंगले की दर-दीवारों में खुशियां ढूंढ रहे ।
तब, दूर-दूर में भी सभी एक-एक का साथ था,
अब, इतने सारे साथ, पर एक का भी साथ ना रहा ।
तब, पैसे कम, मुश्किलों में ख़ुशी से ज़्यादा खेलते थे,
अब, पैसों से खेलने की मुश्किल, ख़ुशी कम देते हैं ।
तब, हम छोटे और उन जैसे बड़े होने की चाह थी,
अब, उन जैसा हो गए तो लगा हमारी नहीं यह राह है ।
अब, यह अब है तो अब में रहेंगे, तब ना करेंगे,
अब, फिर कुछ कर जाने का जूनून उत्पन्न करेंगे ।
अब, जो खोया है वो पाएंगे, जो पाया है उसे फिर पाएंगे,
अब, पेड़ है तो फल-फूल लाएंगे, फिर इंसानियत की बीज बोएंगे ।

