जिस खेत को खून-पसीने से सींचा था,

बारिश चाहे सूखा, पुर जतन से जोता था ।

बंजर में भी हरियाली लाने की ख्वाइश थी,

कुछ नहीं में बहुत कुछ कर जाने की फरमाइश थी ।

 

विश्वास की नीव पर छोटे-छोटे बीज बोए,

अंकुर हुए तो खुश ओर कभी नहीं, तो रोए ।

एक एक अंकुर बढ़कर एक दिन, ऐसा सुंदर बगीचा होगा,

इतना बड़ा भी दिन आएगा, यह किसने कभी सोचा होगा ।

 

इतने सुंदर फूल-फल देखकर किसका मन ना ललचाएगा,

बना बनाया मिल जाए फिर कौन बीज उपजाएगा ।

नहीं पाला है तो क्या जाने, हर एक पौधे की वो नज़ाकात,

पौधा जब कुछ दे या ना दे, करना जाने उसकी इज़्ज़त ।

 

बगीचा खेत लेकर तुमने सर पर ताज सुनेहरा लगाया,

जिसने इससे हक़ीकत बनाया पर, क्या तुमने इज़्ज़त का एहसास ज़रा दिलाया ।

पौधों पर तो इंसानियत नहीं, इनको उखाड़ जाओगे,

माली के प्रति आभार नहीं, उसका भी दिल क्या चीर खाओगे ।

 

देना ही सीखा है, देकर ही जाएँगे,

ना कुछ लाए थे, ना कुछ लेकर जाएँगे ।

सबका अच्छा किया और अच्छाई ही चाहेंगे

बस इस आस में, तुममे भी यह अच्छाई के बीज बोएंगे ।

 

बदले की नहीं आग है,

बदलने की पर आस है ।

तुम तो मैं नहीं हो सकते, पर मेरी प्रयास सफल हो जाए,

सोचोगे ही अगर ज़रा बस, मेरा एहसास प्रवल हो जाए ।