न ज़ेवर, न कंगन, न कोई हार चाहिए,

तेरे माथे को बस एक श्रूंगार चाहिए।

जो देखूँ तुझे तो वक़्त ठहर-सा जाए,

मेरी दुआ है कि तू मुझको मिल जाए।

जब धूप तेरे चेहरे को चुपके से छू जाती है,

तेरी बिंदी और भी उजली नज़र आती है।

जैसे सुबह ने सूरज को माथे पर सजाया हो,

या खुदा ने चाँद को धरती पर बुलाया हो।

तेरी बिंदी में जैसे रब की रज़ा मिलती है,

उसमें मेरी हर अधूरी दुआ खिलती है।

लोग कहते हैं ये बस एक लाल निशानी है,

मैं कहता हूँ, इसमें मेरी पूरी कहानी है।

रचनाकार: प्रखर कुमार सागर